जाने है कहाँ भटकता, मन कहीं नही है लगता
एक बेचैनी है मन में, कोई साज अधूरा लगता
वो सरगम आज अधूरी, जाकर मैं किसे सुनाऊँ
तुम जो रूठे हो साजन, सोचा अब तुम्हें मनाऊँ
थी प्रेम दिवस की बेला, मुझको आता था रोना
तुम आए थे सपनों में, मचला मन का हर कोना
था रूप सलोन्ना सुन्दर, शृंगार किया था अद्भुत
जब नज़र मिली थी तुमसे, मुझको ना थी मेरी सुध कुछ
स्पर्श तुम्हारा कोमल, था बदन दहकता जाता
अहसास तेरे आना का, मन की बगिया महकाता
रसपान किया अधरों से, जन्मों की प्यास बुझाई
मैं था तुझमें; तू मुझमें, नज़रें मेरी लज्जाई
जब आँख खुली तो पाया, ये तो था निरर्थक सपना
तुम हो मेरी मैं तेरा, सपना अब होगा अपना
❤
एक बेचैनी है मन में, कोई साज अधूरा लगता
वो सरगम आज अधूरी, जाकर मैं किसे सुनाऊँ
तुम जो रूठे हो साजन, सोचा अब तुम्हें मनाऊँ
थी प्रेम दिवस की बेला, मुझको आता था रोना
तुम आए थे सपनों में, मचला मन का हर कोना
था रूप सलोन्ना सुन्दर, शृंगार किया था अद्भुत
जब नज़र मिली थी तुमसे, मुझको ना थी मेरी सुध कुछ
स्पर्श तुम्हारा कोमल, था बदन दहकता जाता
अहसास तेरे आना का, मन की बगिया महकाता
रसपान किया अधरों से, जन्मों की प्यास बुझाई
मैं था तुझमें; तू मुझमें, नज़रें मेरी लज्जाई
जब आँख खुली तो पाया, ये तो था निरर्थक सपना
तुम हो मेरी मैं तेरा, सपना अब होगा अपना
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