Tuesday, May 12, 2020

मलाल है

शगुफ्ता चेहरा, सियाह गेसू, जवान मस्ती, कमाल है
घनी सी पलकें, तेरी ये शोखी, तेरा ये जादू, कमाल है
तेरे बिना हो, क्या मेरा रास्ता, मेरा ये खुद से सवाल है
किसे बताऊं मैं ये कहानी , हुआ ये बकरा हलाल है
ताउम्र रहना, तेरे बिना है, ये ज़िन्दगी का मलाल है

Monday, May 11, 2020

कुछ और बात

दीदार ने तेरे मुझे, काफिर बना दिया
ताउम्र साथ होता, तो कुछ और बात होती

दो पल के साथ ने तेरे, इंसान बना दिया
ताउम्र साथ होता, तो कुछ और बात होती

तेरे मुस्कुराने से मेरी, अंजुमने खिल उठी
ताउम्र साथ होता, तो कुछ और बात होती

यूं छोड़ कर नहीं कोई, जाता गमों के बीच
ताउम्र साथ होता, तो कुछ और बात होती

यादें तेरी रूहानी, मुझमें बसी हुई
ताउम्र साथ होता, तो कुछ और बात होती

Sunday, May 10, 2020

तुलसी और रहीम

उन दिनों आचरण में नितान्त संकीर्ण साम्प्रदायिक रहते हुए भी वोट के लिए तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की खाल ओढ़ना लोग नहीं सीख पाए थे। अब्दुर्रहीम खानखाना सम्राट अकबर का निमंत्रण लेकर तुलसी तक गए। यह निमंत्रण तत्कालीन एशिया की सबसे बड़ी और शक्तिशाली सल्तनत की ओर से भेजा गया था, जबकि सम्राट की इच्छा उसकी आज्ञा ही कानून थी। असंग तुलसी ने सविनय दृढ़ अस्वीकार दिया-
हौं तो चाकर राम को पटो लिखो दरबार,
तुलसी अब का होंयगे नर के मनसबदार।

और कोई होता तो वह इसे निजी व्यक्तिगत मान-सम्मान का प्रश्न बनाता। उसका अहंकार विकृत कुरूप होकर उभर आता, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। महामना रहीम ने इस विनम्र दृढ़ अस्वीकृति को अपनी प्रणति दी। हम में, हमारी सारस्वत बिरादरी में कोई ऐसा है तो, जो बड़े से बड़े ऐश्वर्य वैभव के प्रलोभन को सहज ही अनायास निरभिमान होकर ठोकर मार सकता है। अपने आराध्य से इतर किसी भी सिंहासन की सविनय अवज्ञा दे सकता है।

तुलसी के पास एक विधवा ब्राह्मणी अपनी बेटी के विवाह के लिए वांछित धन की कामना से आई। उस समय तक तुलसी सिद्ध सन्त के रूप में विख्यात हो चुके थे। तुलसी के पास रामरतन अथवा राम रसायन के अलावा धन कहां? वे तो ठहरे निहंग वैरागी, परंतु उस भरोसे का क्या हो, जिसके चलते वह ब्राह्मणी उनके पास आई थी? उसकी तो रक्षा करनी ही होगी। तुलसी ने एक पुरजा देकर ब्राह्मणी को खानखाना के पास भेज दिया। पुरजे में लिखा था, 'सुरतिय, नरतिय, नागतिय, अस चाहत सब कोय।' उनका आशय था कि प्रत्येक नारी यह चाहती है कि उसकी बेटी का विवाह भले घर में हो, उसे सुपात्र मिले और वह सुखी रहे। वे तुलसी का कहा कुछ कर सकेंगे, इसकी कल्पना मात्र से खानखाना निहाल हो गए। कहना न होगा कि ब्राह्मणी को उसकी आवश्यकता से कहीं अधिक धन मिला। अब्दुर्रहीम खानखाना ने उसी पुरजे पर दूसरी पंक्ति लिखकर गोस्वामी तुलसीदास जी को भिजवा दी -
सुरतिय, नरतिय, नागतिय अस चाहत सब कोय,
गोद लिए हुलसी फिरे तुलसी सो सुत होय।
खानखाना की पंक्ति से सारे संदर्भ की संवेदना ही बदल गई। इसी संदर्भ में आधुनिक रसखान की उपाधि से अभिनन्दित जनाब अब्दुलरशीद 'रसदी' साहब की निम्नांकित पंक्तियां द्रष्टव्य हैं -
हुलसी तुलसी फिरत है, हुलसी तुलसी पाय,
हुलसी तुलसी जगत मंह, और कौन हैं माय?
कहा जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने बरवै रामायण भी खानखाना की प्रेरणा और आग्रह से रची थी। मुगल सम्राट अकबर की सेना का एक सिपाही गौने के लिए छुट्टी लेकर गया था। मानव सुलभ सहज दुर्बलता के अधीन, स्वीकृत अवकाश की अवधि से उसकी अनुपस्थिति अधिक हो गई। सैनिक अनुशासन के अंतर्गत इस अनुशासनहीनता के लिए उसे कितना कठोर दंड मिल सकता है, इसी आशंका से वह बिछुड़न की उदासी के अतिरिक्त और भी उदास हो गया। उसकी नवपरिणीता वधू भी कवयित्री है। वह पति को एक पुरजा देते हुए कहती है कि वह सीधे काम पर न जाकर खानखाना से मिलकर वह पुरजा उन्हें दे। रहीम ने वह पुरजा पढ़ा -
'नेह प्रेम को बिरवा रोप्यो जतन लगाय,
सीचन की सुधि लीजियो देखेहु मुरझि न जाय।'
अब्दुर्रहीम खानखाना सर से पांव तक डबडबा गए। उन्होंने बादशाह से सिफारिश कर न केवल उसकी खता माफ करायी, वरन और छह माह का अवकाश दिला दिया। उस सैनिक को उन्होंने ढेर सा उपहार दिया, 'मेरी बेटी, अपनी बहू को यह भेंट देना और यह पुरजा गोस्वामी जी को देते हुए कहना, रहीम का यह आग्रह है, आप इस छंद में पुन: रामकथा रचें।' रहीम मानस के सन्दर्भ में कहते हैं
राम चरित मानस विमल, सन्तन जीवन प्रान,
हिन्दुवान को वेद सम, जमनहि प्रगट कुरान।
चित्रकूट में तुलसी और रहीम सहयात्री हैं, इस प्रसंग में अनेक किंवदन्तियां प्रचलित हैं। यथा- तुलसी का प्रश्न एक पंक्ति में और रहीम का उत्तर दोहे की दूसरी में, जरा देखें-
धूर उड़ावत सिर धरत कहु रहीम केहि काज?
जेहि रज मुनि पत्नी तरी, सो ढूंढत गजराज।
स्वयं भगवान राम वनवास अवधि में चित्रकूट गए, वाराणसी में सताए जाने पर गोस्वामी तुलसीदास जी चित्रकूट गए और अपने अंतिम दिनों में, जब मुसीबत के मारे अब्दुर्रहीम खानखाना चित्रकूट पहुंचे तो उन्होंने कहा-
चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेस।
जा पर विपदा परत है, सो आवत यही देस।

Source- Google and Wikipedia

Saturday, May 9, 2020

कर्ण : एक द्वंद - भाग १

हमारे बचपन में दूरदर्शन पर रामायण, श्रीकृष्णा और महाभारत का प्रसारण होता था। घर के सभी सदस्य साथ बैठकर रामायण और महाभारत देखते थे और उनके साथ मैं भी बहुत चाव से टेलीविजन देखा करता था। दशहरा का समय आते ही पापा से धनुष बाण लाने की ज़िद करने लगता, और जब पापा धनुष बाण ला देते तो मैं उसे राम जी की तरह कंधे पर टांग कर पूरे घर में धमा चौकड़ी मचाता।

बचपन में हमारी नैतिकता बाइनरी होती है। कहने का अर्थ है सब कुछ काला और सफेद होता है - राम अच्छे और रावण बुरा; पांडव, कृष्ण, उनके साथी अच्छे और कौंरव, उनके साथी बुरे। हमारे बड़े होने पर शायद यही नैतिकता सही और ग़लत, धर्म और अधर्म का रूप लेती है।

आजकल पूरा विश्व कोरॉना महामारी से पीड़ित है, सम्पूर्ण देश में लाकडाउन है। ऐसे में सरकार ने पुनः दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत प्रसारित करने का निर्णय लिया। यह सुन कर मन में नॉस्टैल्जिया का भाव आया। आपको बता दूं वर्तमान समय में मैं अपनी पत्नी के साथ हरिद्वार में रहता हूं और यहां हमारे पास टेलीविजन नहीं है, तो इस बार इन दोनों धारावाहिकों को देखने का सवाल नहीं था। एक दिन अचानक से पत्नी ने खाना खाते वक्त महाभारत देखने की इच्छा प्रकट की और मैंने यूट्यूब पर महाभारत चला दी। उस दिन से प्रतिदिन खाना खाते समय महाभारत देखना शुरू हो गया। अभी कुछ ही दिनों पहले ही मैंने महाभारत देख कर समाप्त की।

लेकिन इस बार सब कुछ पहले जैसा नहीं था, मन में एक द्वंद था। शायद इस बार नैतिकता वस्तुनिष्ठ या फिर बाइनरी नहीं लग रही थी। अगर शकुनि का द्यूत में छल करना अनैतिक था, द्रौपदी का वस्त्र हरण अनैतिक था, पांडवों को राज्य ना दिया जाना अनैतिक था, अभिमन्यु का वध अनैतिक था तो क्या एक अबोध बालक का जन्म लेते ही मां के द्वारा त्याग अनैतिक नहीं था? क्या एक क्षत्रिय को जीवन भर सूत पुत्र कह कर संबोधित करना, जाति प्रथा के कारण एक प्रतिभाशाली युवक का जीवन भर तिरस्कार करना, इन्द्र द्वारा छल से कवच कुंडल ले लेना, कृष्ण द्वारा अर्जुन का रथ अंगूठे से दबा कर उसकी जीवन रक्षा और अंतिम समय में निहत्थे कर्ण पर प्रहार करना अनैतिक नहीं था?

वास्तव में कर्ण महाभारत का सबसे उपेक्षित चरित्र है। इतना उपेक्षित की शायद इतिहास ने भी कर्ण को भुला दिया। मेरी समझ में हिंदी में शायद दिनकर ( रश्मिरथी) के सिवाय किसी अन्य कवि ने कर्ण को अपनी रचना का विषय नहीं बनाया। शिवाजी सावंत नामक मराठी लेखक ने मृत्युन्जय नामक एक नाटक कर्ण पर लिखा है। महाभारत देखने के बाद मैंने रश्मिरथी और मृत्युंजय - दोनों रचनाओं को पढ़ा और इनको पढ़ने के बाद मेरे मन का द्वंद और भी गहरा हो गया, अनायास ही मेरे मन में यह प्रश्न आया," क्या कर्ण के साथ किसी प्रकार का अन्याय तो नहीं हुआ?" इतना महान धनुर्धर, दानवीर, साहसी, निष्ठावान, वचनबद्ध योद्धा लेकिन इतिहास के पन्नों से वंचित।

to be continued....

Friday, May 1, 2020

अलविदा इरफ़ान

इरफान भाई,
आज आपके जाने पर ऐसा लगा जैसे कोई अपना, कोई जानने वाला चला गया। पहले तो यकीन नहीं हुआ, और जब यकीन हुआ तो आंख भर आयी। हासिल के रणविजय का चेहरा सामने आ गया।
आपको सबसे पहली बार मैंने हासिल में देखा था। उस वक्त में बीटेक में हुआ करता था और कई दिनों तक रणविजय सिंह और गौरी शंकर पाण्डेय का भूत सर से नहीं उतरा।
सलाम बॉम्बे तो नहीं देखी लेकिन मकबूल, Life in a metro, Knockout, पिकू, करीब करीब सिंगल, पान सिंह तोमर, लंच बॉक्स  और भी अनेक फिल्मों में क्या ताबड़तोड़ अभिनय था आपका। भावनाओं की तीव्रता, चेहरे की भाव भंगिमा, range of emotions- सब कुछ एक दम विलक्षण।  अभी कल ही tokyo trials देख रहा था और वहां भी जस्टिस पाल का अदभुत अभिनय ।  बॉलीवुड का स्तर उठाने के लिए आपकी धन्यवाद। तथाकथित हीरोज की भीड़ में अभिनेता होने के लिए धन्यवाद।
आपने स्वयं कहा था- " I suppose, in the end, whole life becomes an act of letting go. But what always hurts the most is not taking a moment to say good bye." और आप खुद, बिना गुड बाय बोले चले गए।

बहुत ज्यादा तो नहीं लिख पाऊंगा लेकिन ये जरूर कहूंगा की रणविजय भैया को इतनी जल्दी नहीं जाना था, और रणविजय भैया हमारे साथ रहेंगे जब तक हम रहेंगे।

                                                         आपका एक चाहने वाला