Thursday, February 16, 2017

हम-तुम

जाने है कहाँ भटकता, मन कहीं नही है लगता
एक बेचैनी है मन में, कोई साज अधूरा लगता
वो सरगम आज अधूरी, जाकर मैं किसे सुनाऊँ
तुम जो रूठे हो साजन, सोचा अब तुम्हें मनाऊँ

थी प्रेम दिवस की बेला, मुझको आता था रोना
तुम आए थे सपनों में, मचला मन का हर कोना
था रूप सलोन्ना सुन्दर, शृंगार किया था अद्भुत
जब नज़र मिली थी तुमसे, मुझको ना थी मेरी सुध कुछ

स्पर्श तुम्हारा कोमल, था बदन दहकता जाता
अहसास तेरे आना का, मन की बगिया महकाता
रसपान किया अधरों से, जन्मों की प्यास बुझाई
मैं था तुझमें; तू मुझमें, नज़रें मेरी लज्जाई

जब आँख खुली तो पाया, ये तो था निरर्थक सपना
तुम हो मेरी मैं तेरा, सपना अब होगा अपना

Tuesday, January 24, 2017

पथिक पथ पर

रे पथिक पथ पर चला चल, विकट बाधा आएँगी
मन में रख उत्साह, तुझको मंज़िलें मिल जाएँगी

समय थोड़ा कठिन होगा, राह में काँटें मिले
पर हमेशा याद रखना कमल कीचड़ में खिले

ले प्रभु का नाम, अपने धर्म का निर्वाह कर
सतत विपदाओ से लड़कर कर्म की जयकार कर

ज़िंदगी तेरी, की तू है इसका सृजनहार
हठी मन से तू लगा दे, आज इस नौका को पार

ज्यों निशा के बाद हर दम, सूर्य उगता है यहाँ
कर तू नभ में आज बदल बन के भीषण गर्जना

क्या जगत है सोचता, इस से तेरा क्या वास्ता
मार्ग अपना स्वयं चुन, ख़ुद ही बना ले रास्ता

रे पथिक पथ पर चला चल, विकट बाधा आएँगी
मन में रख उत्साह, तुझको मंज़िलें मिल जाएँगी


प्रभु का आशीष

ज़िंदगी, दो पलों का कारवाँ, निकल पड़ा मंज़िल की ओर
क्या खोएगा रास्ते में, नही मिल रहा इसको छोर

गिले शिकवे, ऐंठ की ये सूगबूगाहट
अश्रु संचित नेत्र करते है बग़ावत

मोड़ कैसा आया तेरे इस सफ़र में
सारे रिश्ते तेरे अब लगते बिखरने

किसको छोड़ो किसको पकड़ो मन में ये उत्पात है
वंदना करता प्रभु की, स्नेहिजनो का साथ है

हे प्रभु, आशीष दो, मुझमें मेरा विश्वास हो
है लक्ष्य को अब भेदना, कितने विकट हालात हो ।


रण

कष्टों से कब घबराया है, क्यूँ आज तू यूँ सकुचाया है
तेरा लोहा सब मान चुके, नभ दिशा चितिज पहचान चुके
तू सूर्य पुत्र कौनतेय कर्ण, बन करमवीर सृष्टि है रण
इस रण में विजय तो पानी है, वरना बेकार जवानी है

है आज लड़ाई ख़ुद से ही, तू ख़ुद रिपु है अरि है तू ही
दावानल में कांतार जला, पर विश्वामित्र तनिक ना हिला
तू रावण बन, हठ योग दिखा, पाना है जो, वो छीन के ला
कर रक्तपान, बदलो विधान , बेड़ियाँ तोड़ , संशय को छोड़

उन्मुक्त करो, अपने मन को, दो तान आज इस सरगम को
मनु ख़ुद से कभी ना हारा है, मनु तो श्री हरि का प्यारा है
जब मन में संशय आया था, श्री हरि ने पाठ पढ़ाया था
हे अर्जुन तू गांडीव चला, निज धर्म निभा; ना अब क़तरा

नभ अच्छादित हो काँप उठा, भू डोल उठी सागर हिलरा
मनु ने पुरुषार्थ को सिद्ध किया, रण उसने रिपु से जीत लिया
सारे पदार्थ है इस जग में, पर करमहीन कुंठित मन में
कर्तव्यों का निर्वाह करो, मन को बंधन में ना जकडों
जयकार करेगा जग सारा, मिल जाए तुमको लक्ष्य तुम्हारा

अर्पित शुक्ला