Saturday, December 29, 2012

Haal-e-Hindustan

 अचम्भित  विकट बेजुवानो़ं का चेहरा
निडर है तु क्यों देखकर इनका पेहरा
क्या कमी थी तुझे एक  सपना था सुन्दर
क्यों बनने चला इस  सदी का सिकन्दर
व्यथित  और कुपित  कर  दिये शख्स तूने
हुये क्षत -विक्षत  धरातल  के कोने
चढा शीर्ष  पर कर पतन  दूसरों का
किये जा रहा तू विखंडन  धरा का
निराधार  विकृत  हुये त थ्य तेरे
प्रसारित  हैं क्यों भ्रान्तियों के अंधेरे
हुये तीव्र घातक  वो अज्ञान  के स्वर
उड़ेगा तू कब तक  लिये काठ के पर
गिरेगा तू एक  दिन  इसी राज  पथ  से
बचेगा ना तू कोटि मुण्डों के हठ से
चुभोये धरा में गहन  दंश  जितने
नपुंसक  बनेंगे तेरे वंश  उतने........

1 comment:

  1. bahut khoob...:) tmhare shabdo mein samarthya hai samai ki samvedansheelta ko samjhane ki!!!

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