Sunday, June 14, 2026

रिश्तों की रस्साकशी

घर के बड़े-बुज़ुर्गों को अक्सर कहते सुना था कि "शादियाँ भगवान के यहाँ से तय होकर आती हैं।" बचपन और युवावस्था में इस बात पर कभी विशेष विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब मेरी अपनी शादी उसी लड़की से हुई, जिससे एक साल पहले बात बनते-बनते रह गई थी, तब लगा कि शायद सचमुच कुछ रिश्ते कहीं पहले से लिखे होते हैं।

मेरी शादी को अब सात साल से कुछ अधिक समय हो चुका है। इन वर्षों में अपनी शादी, अपने दोस्तों और करीबियों के वैवाहिक जीवन को देखते हुए उस पुरानी मान्यता पर मेरा विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा है। अब कभी-कभी लगता है कि यदि जोड़ियाँ कहीं ऊपर तय होती हैं, तो उनके टूटने का निर्णय भी शायद वहीं से आता होगा या फिर जोड़े यहीं बनते हैं, और यहीं टूटते हैं।

कुछ दिन पहले अख़बार में एक लेख पढ़ा। एक दंपत्ति ने अपने वैवाहिक जीवन के 60 वर्ष पूरे किए थे। जब अंकल जी से सफल दाम्पत्य जीवन का रहस्य पूछा गया, तो उनका उत्तर था—

"मैंने इनसे हर नए रूप में प्रेम किया। विवाह के तुरंत बाद इनका एक रूप था, बच्चों के जन्म के बाद दूसरा, बच्चों के बड़े होने पर तीसरा, और बच्चों की शादी के बाद एक बिल्कुल अलग रूप। हर पड़ाव पर मैंने इन्हें नए सिरे से स्वीकार किया और प्रेम किया।"

यह बात पढ़कर मन बहुत देर तक सोचता रहा। शायद उनकी पीढ़ी के लिए यह सत्य था। शायद उनके भीतर धैर्य, समर्पण और रिश्तों को निभाने की क्षमता अधिक थी। लेकिन आज की पीढ़ी को देखकर लगता है कि परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। आज रिश्ते केवल प्रेम और समझ पर नहीं, बल्कि महत्वाकांक्षाओं, व्यक्तिगत अपेक्षाओं और हितों के टकराव के बीच खड़े हैं। शायद यही कारण है कि आज बहुत से युवा विवाह से दूरी बनाना पसंद करते हैं।

मैं किसी और की ओर से नहीं बोल सकता, लेकिन अपने अनुभव और कुछ करीबी मित्रों के जीवन को देखकर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि एक मध्यमवर्गीय लड़के के लिए "शादी किससे करूँ?" का निर्णय अक्सर बहुत बड़ी दुविधा बन जाता है। अधिकांश मामलों में माता-पिता लड़के की पसंद को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते। संस्कारों, पारिवारिक अपेक्षाओं और सामाजिक दबावों के बीच अंततः लड़का माता-पिता के निर्णय को स्वीकार कर लेता है।

उसके बाद की स्थिति कुछ-कुछ लॉटरी के परिणाम जैसी होती है।अगर सब कुछ अच्छा रहा, तो मानो लॉटरी लग गई—परिवार खुश, समाज खुश, और आप भी खुश। लेकिन यदि रिश्ता अपेक्षा के अनुरूप नहीं चला, तो उसकी कीमत केवल आपको चुकानी पड़ती है। बाकी लोग आपको सलाह देंगे, ज्ञान देंगे, सहानुभूति देंगे, लेकिन आपके हिस्से का संघर्ष कोई नहीं जी सकता।

वैसे भी ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। किसी भी विवाह के सफल या असफल होने में गलती शायद केवल एक व्यक्ति की नहीं होती। रिश्ते में रस्साकशी दोनों तरफ से चल रही होती है। दोनों अपने-अपने विचारों, अपेक्षाओं और अहंकारों के साथ उस रस्सी को खींच रहे होते हैं। फर्क केवल इतना होता है कि कौन कितना ज़ोर लगाता है और किस ओर की रस्सी पहले टूटती है। और जब रस्सी टूट जाती है, तो खेल समाप्त हो जाता है।

शायद विवाह का सबसे कठिन पक्ष यही है कि इसमें जीत किसी एक की नहीं होती। या तो दोनों साथ जीतते हैं, या फिर दोनों किसी न किसी रूप में हार जाते हैं।

समय के साथ मुझे इतना जरूर समझ आया है कि सफल विवाह का रहस्य शायद सही व्यक्ति मिलने में नहीं, बल्कि दो अपूर्ण व्यक्तियों के एक-दूसरे को स्वीकार करने में छिपा है।

और मुझे नहीं पता कि जोड़ियाँ सचमुच ऊपर बनती हैं या नहीं। लेकिन इतना समझ में आता है कि ऊपर से केवल एक रिश्ता मिलता है, उसे जीवन भर निभाने की कला हमें स्वयं सीखनी पड़ती है।

आखिरकार विवाह कोई मंज़िल नहीं है, बल्कि दो लोगों द्वारा हर दिन साथ मिलकर तय की जाने वाली एक यात्रा है।

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