Tuesday, January 24, 2017

रण

कष्टों से कब घबराया है, क्यूँ आज तू यूँ सकुचाया है
तेरा लोहा सब मान चुके, नभ दिशा चितिज पहचान चुके
तू सूर्य पुत्र कौनतेय कर्ण, बन करमवीर सृष्टि है रण
इस रण में विजय तो पानी है, वरना बेकार जवानी है

है आज लड़ाई ख़ुद से ही, तू ख़ुद रिपु है अरि है तू ही
दावानल में कांतार जला, पर विश्वामित्र तनिक ना हिला
तू रावण बन, हठ योग दिखा, पाना है जो, वो छीन के ला
कर रक्तपान, बदलो विधान , बेड़ियाँ तोड़ , संशय को छोड़

उन्मुक्त करो, अपने मन को, दो तान आज इस सरगम को
मनु ख़ुद से कभी ना हारा है, मनु तो श्री हरि का प्यारा है
जब मन में संशय आया था, श्री हरि ने पाठ पढ़ाया था
हे अर्जुन तू गांडीव चला, निज धर्म निभा; ना अब क़तरा

नभ अच्छादित हो काँप उठा, भू डोल उठी सागर हिलरा
मनु ने पुरुषार्थ को सिद्ध किया, रण उसने रिपु से जीत लिया
सारे पदार्थ है इस जग में, पर करमहीन कुंठित मन में
कर्तव्यों का निर्वाह करो, मन को बंधन में ना जकडों
जयकार करेगा जग सारा, मिल जाए तुमको लक्ष्य तुम्हारा

अर्पित शुक्ला 

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