Saturday, May 9, 2020

कर्ण : एक द्वंद - भाग १

हमारे बचपन में दूरदर्शन पर रामायण, श्रीकृष्णा और महाभारत का प्रसारण होता था। घर के सभी सदस्य साथ बैठकर रामायण और महाभारत देखते थे और उनके साथ मैं भी बहुत चाव से टेलीविजन देखा करता था। दशहरा का समय आते ही पापा से धनुष बाण लाने की ज़िद करने लगता, और जब पापा धनुष बाण ला देते तो मैं उसे राम जी की तरह कंधे पर टांग कर पूरे घर में धमा चौकड़ी मचाता।

बचपन में हमारी नैतिकता बाइनरी होती है। कहने का अर्थ है सब कुछ काला और सफेद होता है - राम अच्छे और रावण बुरा; पांडव, कृष्ण, उनके साथी अच्छे और कौंरव, उनके साथी बुरे। हमारे बड़े होने पर शायद यही नैतिकता सही और ग़लत, धर्म और अधर्म का रूप लेती है।

आजकल पूरा विश्व कोरॉना महामारी से पीड़ित है, सम्पूर्ण देश में लाकडाउन है। ऐसे में सरकार ने पुनः दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत प्रसारित करने का निर्णय लिया। यह सुन कर मन में नॉस्टैल्जिया का भाव आया। आपको बता दूं वर्तमान समय में मैं अपनी पत्नी के साथ हरिद्वार में रहता हूं और यहां हमारे पास टेलीविजन नहीं है, तो इस बार इन दोनों धारावाहिकों को देखने का सवाल नहीं था। एक दिन अचानक से पत्नी ने खाना खाते वक्त महाभारत देखने की इच्छा प्रकट की और मैंने यूट्यूब पर महाभारत चला दी। उस दिन से प्रतिदिन खाना खाते समय महाभारत देखना शुरू हो गया। अभी कुछ ही दिनों पहले ही मैंने महाभारत देख कर समाप्त की।

लेकिन इस बार सब कुछ पहले जैसा नहीं था, मन में एक द्वंद था। शायद इस बार नैतिकता वस्तुनिष्ठ या फिर बाइनरी नहीं लग रही थी। अगर शकुनि का द्यूत में छल करना अनैतिक था, द्रौपदी का वस्त्र हरण अनैतिक था, पांडवों को राज्य ना दिया जाना अनैतिक था, अभिमन्यु का वध अनैतिक था तो क्या एक अबोध बालक का जन्म लेते ही मां के द्वारा त्याग अनैतिक नहीं था? क्या एक क्षत्रिय को जीवन भर सूत पुत्र कह कर संबोधित करना, जाति प्रथा के कारण एक प्रतिभाशाली युवक का जीवन भर तिरस्कार करना, इन्द्र द्वारा छल से कवच कुंडल ले लेना, कृष्ण द्वारा अर्जुन का रथ अंगूठे से दबा कर उसकी जीवन रक्षा और अंतिम समय में निहत्थे कर्ण पर प्रहार करना अनैतिक नहीं था?

वास्तव में कर्ण महाभारत का सबसे उपेक्षित चरित्र है। इतना उपेक्षित की शायद इतिहास ने भी कर्ण को भुला दिया। मेरी समझ में हिंदी में शायद दिनकर ( रश्मिरथी) के सिवाय किसी अन्य कवि ने कर्ण को अपनी रचना का विषय नहीं बनाया। शिवाजी सावंत नामक मराठी लेखक ने मृत्युन्जय नामक एक नाटक कर्ण पर लिखा है। महाभारत देखने के बाद मैंने रश्मिरथी और मृत्युंजय - दोनों रचनाओं को पढ़ा और इनको पढ़ने के बाद मेरे मन का द्वंद और भी गहरा हो गया, अनायास ही मेरे मन में यह प्रश्न आया," क्या कर्ण के साथ किसी प्रकार का अन्याय तो नहीं हुआ?" इतना महान धनुर्धर, दानवीर, साहसी, निष्ठावान, वचनबद्ध योद्धा लेकिन इतिहास के पन्नों से वंचित।

to be continued....

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