Friday, May 1, 2020

अलविदा इरफ़ान

इरफान भाई,
आज आपके जाने पर ऐसा लगा जैसे कोई अपना, कोई जानने वाला चला गया। पहले तो यकीन नहीं हुआ, और जब यकीन हुआ तो आंख भर आयी। हासिल के रणविजय का चेहरा सामने आ गया।
आपको सबसे पहली बार मैंने हासिल में देखा था। उस वक्त में बीटेक में हुआ करता था और कई दिनों तक रणविजय सिंह और गौरी शंकर पाण्डेय का भूत सर से नहीं उतरा।
सलाम बॉम्बे तो नहीं देखी लेकिन मकबूल, Life in a metro, Knockout, पिकू, करीब करीब सिंगल, पान सिंह तोमर, लंच बॉक्स  और भी अनेक फिल्मों में क्या ताबड़तोड़ अभिनय था आपका। भावनाओं की तीव्रता, चेहरे की भाव भंगिमा, range of emotions- सब कुछ एक दम विलक्षण।  अभी कल ही tokyo trials देख रहा था और वहां भी जस्टिस पाल का अदभुत अभिनय ।  बॉलीवुड का स्तर उठाने के लिए आपकी धन्यवाद। तथाकथित हीरोज की भीड़ में अभिनेता होने के लिए धन्यवाद।
आपने स्वयं कहा था- " I suppose, in the end, whole life becomes an act of letting go. But what always hurts the most is not taking a moment to say good bye." और आप खुद, बिना गुड बाय बोले चले गए।

बहुत ज्यादा तो नहीं लिख पाऊंगा लेकिन ये जरूर कहूंगा की रणविजय भैया को इतनी जल्दी नहीं जाना था, और रणविजय भैया हमारे साथ रहेंगे जब तक हम रहेंगे।

                                                         आपका एक चाहने वाला

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